हिन्दी,बिन्दी और बातें !

महाविद्यालय के हिन्दी विभाग से लेकर इंदिरा काॅलोनी के बडे़ गेट तक मैं ‘प्रोफेसर साहब’ होता  हूँ। और वहॉं से अपने घर की दहलीज़ तक ‘भट्ट साहब’ । घर के अंदर कदम रखते ही मैं ‘ए जी, सुनो जी’ हो जाता हूँ।  सच कहूँ तो अपनापन तब ही लगता है जब लोग आपको आपके ओहदे से नहीं बल्कि  प्यार से पुकारते हैं । दिन के चारों पहर, ‘ए जी सुनो जी’ सुनना ,ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया घूम लेने के बाद घर का बरामदा लगता है- कुछ अपना सा । अपनापन से याद आया कि मैंने  इस कहानी की महानायिका – मेरी पत्नी बेला का परिचय तो दिया ही नहीं। महादेवी दुर्गा के मस्तक पर टिकी ब्रह्मांड की बिंदी के समान ओजस्वी है मेरी पत्नी बेला । और उतनी ही ओजपूर्ण हैं उसकी बातें  । बात हो, गली के कुत्ते ‘ छोटू’ की चोटिल हो जाने की या फिर सिपाही बेला द्वारा बड़ी अलमारी के ऊपर से डिब्बे निकालने की, बेला हर मामूली सी बात को कान्स  फिल्मोत्सव में प्रदर्शित  होने वाली फिल्म की तरह रोचक बना देती है। एक बार डिस्कवरी चैनल देखते हुए मैंने यूं ही बेला से कह दिया था कि मूर्ख हैं वो लोग, जो चीन की दीवार को सबसे लम्बा और ऊँचा  मानते  हैं, उन्होंने कभी तुम्हारी बातें नहीं सुनी न ! मेरे व्यंग्यात्मक शब्दों का परिणाम, मेरी मूर्खता का प्रमाण  बन गया जब क्रोध में बेला ने अगले दो दिन टिफिन का डब्बा नहीं दिया।

इन्दिरा कालोनी में शिफ्ट होने के बाद यहाँ शादी जैसे किसी बड़े सार्वजनिक समारोह में सम्मलित होने का यह मेरा पहला अवसर था I लगभग पूरी सोसाइटी ही आमंत्रित थी I मेरी बमुश्किल तीन – चार लोगों से पहले भेंट हुई थी ,वह भी औपचारिक,इसलिए सभी औपचारिकताओं और परिचय के बाद मैं मूक दर्शक की भांति खड़ा हो गया था Iहम पुरुष वैसे भी गपशप के मामले में स्त्रियों से काफी पीछे हैं I मैं देख रहा था कि पत्नी बेला स्त्रियों के झुंड में काफी सक्रिय भूमिका अदा कर रही थी I

हुंह, चौबीस घंटे खाली बैठे रहने वालों को काम ही क्या है ? इधर उधर घूमना ,लगी बुझाई करना , वैसे भी इन स्त्रियों के पास बातों के अलावा और है ही क्या ? अक्सर मैं सोचता था कि बेला ने अपना व्हाट्सऐप ग्रुप भी बना रखा है , और दिनभर व्हाट्सऐप पर लगे रहने के बावजूद इनकी बातें ख़त्म  नहीं होती  और शायद ही यह कभी ख़त्म  होंगी ।

बेला के  नेतृत्व कौशल पर मुझे कभी कोई शक नहीं था पर आज स्त्रियों के झुण्ड में अपनी पत्नी को उभरता देख , गर्व महसूस हो रहा था। अनायास ही एक विचार आया कि बेला हू-ब-हू हिन्दी भाषा के समान है। जिस तरह हिन्दी , राष्ट्रभाषा का दर्जा पाने के लिए किसी आंतरिक संघर्ष का प्रयोग नहीं चाहती उसी प्रकार बेला  भी सामाजिक स्वीकृति की प्राप्ति की दौड़  में शामिल नहीं होती । बेला स्वयं अपना स्थान बनाना चाहती है, ठीक हिन्दी की तरह जिसे आवश्यकता नहीं है नारों और विज्ञापनों की । शर्मा जी ने कोहनी मारी, तो मैंने देखा कि किस तरह बेला मोबाईल में बेमतलब भिड़ी स्त्रियों को मंच पर ले जा रही है । मैंने चैन की साँस ली कि चलो , कुछ देर के लिए ही सही  ‘अपना प्यारा इंदिरा मोहल्ला’ नाम का वाट्सऐप ग्रुप  शाँत  रहेगा ।

फुर्सत मिली तो मैंने देखा कि शेयर मार्केट के उतार चढ़ाव  और सरकार की बेतुकी नीतियों की बातचीत करके अब सभी पुरूष ऊब चुके हैं और सबका ध्यान अब मंच की ओर है। यही अंतर है बस पुरुषों और स्त्रियों में – बातों को सहेजकर जारी रखने का हुनर , जो केवल भारतीय स्त्रियॉं ही कर सकती हैं ।

शादी-ब्याह के माहौल के उल्लास में वृद्धी  चौगुनी हो गई जब इंदिरा कालोनी के सबसे वरिष्ठ दंपत्ति – गुप्ताज़ मंच पर आए।मेरी प्रकृति के विपरीत, न जाने क्यों , मैं भी इन बेहूदे पलों का बेहद आनंद ले रहा था। यहाँ गुप्ताइन ने पहला ठुमका मारा ही था कि गुप्ताजी ने जो सीटी बजाई कि हम सभी वहीं खड़े खड़े लोटपोट हो गए। आज वातावरण कुछ अलग था। सदियों से काम के अभाव में खाली बैठी स्त्रियों की कौम आज अत्यंत व्यस्त थी। कोई नमक मिर्च वाली बातें नहीं , कोई इधर की उधर नहीं और न ही कोई मायके-ससुराल के दुखड़े। कुछ अलग ही दिन  था आज। अचानक बेला की कही एक बात याद आ गई कि ” भारत में सभी औरतों के सभी दिन एक समान होते हैं “| बेला आमतौर पर कुछ गलत नहीं कहती पर यह तो अतिश्योक्ति हो गई। चलो मान लेते हैं कि ये सच है कि औरतों के सभी दिन समान होते हैं , पर आज का दिन ? आज तो सभी औरतें बहुत खुश थीं। वैसे माँ और बेला तो हमेशा ही खुश रहते हैं, पड़ोस वाली माथुर आंटी भी, बिट्टू की पड़ोसन भी और खुद बिट्टू भी। एक मिनट…क्या ज़्यादातर औरतें खुश रहती हैं हर दिन? तो फिर वाक़ई में औरतों के सभी दिन एक समान होते हैं?

स्त्रियों के इस आयाम का अहसास मेरे कानों में कुछ कह रहा था।  मैंने सुना कि कुछ स्त्रियाँ, दुःख छुपाकर खुश दिखती हैं, कुछ दर्द दबाकर , कुछ स्त्रियाँ खुश हैं अपने परिवार को आगे बढ़ता देख , तो कुछ आख़री निवाला अपनी संतान को देकर भूखी सो जाने में खुश हैं।

तालियों की गूँज से वापस मैरिज हॉल में आया तो देखा – गुप्ताजी बिंदी लगा रहे थे गुप्ताइन को। मैं मुस्कुराया।  औरतों के माथे पे टिकी ये वही ब्रहाण्ड रूपी बिन्दी है !

लच्छू के लक्ष्य

“लच्छू ए लच्छू,अब उठ जा रे ” 

हे अल्लाह ये अम्मी भी ना हद तंग करती हैं । नींद काहे की आई मेरे को , तब से जाग ही तो रहा हूँ । लच्छे खाँ तू किस चक्कर में पड़ रहा है रे ? काश सब पहले जैसा होता । मेरे को तो वो दिन याद आता है जब मैं पहली बार साब को गोन्दलपुर लेकर गया था । लौटते ही तारीफ की थी मेरी , मेरे सेठ से, की ड्रेविंग अच्छी कर लेता है छोरा । एक आध साल पहले ही तो मिले हैं साब मेरे से, मगर परिवार जैसे रखते हैं । पूरा गाँव भेला जानता है की साब लच्छू पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं और साब के भाई बहन भी मेरे सिवा किसी और ड्रेवर के साथ शहर नहीं जाते ।

अरे यार! ये गोपालदास फोन लगाए जा रहा है । ” हल्लो हाँ भैया! जा रहा हूँ साब को लेने। हाँ कर लूँगा बात तुम्हाई । बोली तो है मैंने तुमको। अब फोन रखो ।”

घड़ी इतनी धीमी काये को चल रही , सात ही बजे हैं । साब जब नए थे, मेरे देरी से आने पर खतरनाक डाँटते थे।दो तीन महीने हुए डाँट नहीं खाई ।हाँ तीन महीने ही तो हुए हैं साब का स्वभाव बदले। पहले साब रास्ते भर मेरी बातें सुनते थे मगर अब , ना सोते हुए भी नहीं सुनते। मेरे को नहीं कहते टेंशन अपनी , पर बात करते सुना है मैंने , अपनी मम्मीजी को कह रहे थे की टेबिल ( TA BILL) का टेंशन है थोड़ा।

न जाने क्या चीज़ है ये टेबिल , जिसकी वजह से ये दिन आया है । लप्पू की सालगिरह और ये गोपालदास।साब ने ही आदत बिगाड़ी थी मेरी । मैं ही मूरख था , सपने देखने लगा था । मेरेको थोड़े ही पता था सपने महंगे होते हैं । महंगे तो वो जूते थे जो साब मेरे लिए शहर से लाये थे। गाँव के सारे कहते- ” वाह फर्स्ट क्लास जूते हैं।”अम्मी ने तो ये तक कह दिया की जूते मेरे मुँह से ज्यादा सुन्दर हैं। चार बार कह चुका था साब से, जूतों के लिए । एक बार तो पैसे दे दिए थे साब ने , कहा खुद ही खरीद लेना। पैसों से तो मैंने दो बूसल्ट खरीद ली थी, मेरी भी ज़िद्द थी की साब के पसंद के जूते चाहिए बस ।

 साब की कोई गर्लफ्रेंड नहीं है पर राबिया की सारी बातें बताईं हैं साब को मैंने । साब कहते हैं – राबिया साथ नहीं देगी ज्यादा दिन तक, परिवार ही साथ देगा कब्र तक। उस रोज लप्पू और जिन्नाह के लिए पेस्ट्री खरीदकर दी थी साब ने । ईना तो ख़ुशी के मारे फूले नहीं समा रही थी की मैंने बच्चों के लिए मिठाई लाई है । उसी दिन मेरेको मालूम चला की ईना बहुत ज्यादा सुन्दर है, शायद राबिया से कई ज्यादा क्योंकि ईना के दिल की ख़ुशी उसके चेहरे पे दिखाई देती थी ।

लप्पू और जिन्नाह को साब के कहने पे बड़े स्कूल में डाल दिया है। बस दस दिन बाकी हैं लप्पू की सालगिरह के। काहे को मैंने उससे वादा कर लिया पाल्टी का । अगर साब मान जाते गोपालदास का काम करने के लिए तो वो मेरेको पाँच हज़ार देता। सालगिरह एक नंबर मनाता लप्पू की पूरे गाँव में ।

पैसा , टेबिल , नौकरी , ड्रेवरी , परिवार , इज्जत… हे अल्लाह क्या करूँ मैं ?

“ए ईना ये जिन्नाह क्यों रो रहा है।”

” अरे उसके प्यारे कीड़े से तितली निकल रही है , तो रो रहा है कि कीड़ा मर जायेगा ।”

“चुप करा यार बेंडे को।”

 आह तितली … आज तो जिन्नाह ने सबक सिखा दिया अब्बू को।

“हल्लो भैया, न हो पायेगा काम हमसे।आप कहीं और देख लो।अब फ़ोन रखो।”

अब जाकर मिला है सुकून। लप्पू की सालगिरह अगले साल मना लेंगे धूम धाम से।चलूँ आठ बज गए।साब को भी सुनाऊंगा किस्सा तितली का।