आपके नाम का स्कूल

दौड़-भाग से भरी इस ज़िन्दगी में दादा-दादी की अनुपस्तिथि से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। पर यह बात सिर्फ वही कह सकता है जो या तो जन्म से दादा-दादी के प्रेम से वंचित रहा हो या वो जिसे परिवार-प्रेम की परिभाषा का कोई ज्ञान न हो। भाग्य से, मैं उनमे से हूँ जिनके पिता ने दादा-दादी को सदैव कहानियों में ज़िंदा रखा।

मैंने अपने बाबू (दादाजी) को कभी नहीं देखा पर अम्मा (दादीजी) की कुछेक यादें अब भी कैद हैं ज़हन में। सब कहते हैं मैं अम्मा जैसी दिखती हूँ और मेरी आदतें बाबू जैसी हैं।

परिवार को महत्त्व देने वाले और साधारण सोच रखने वाले मेरे माता पिता ने हमारा बचपन भरा था आदर्शों और मानवीय मूल्यों से जिनके अप्रतिम उदाहरण सदा ही मेरे दादा-दादी और नाना-नानी हुआ करते थे।

बाबू , लाल का पुरवा गाँव के स्कूल के हेडमास्टर हुआ करते थे। वे गाँव और आसपास के क्षेत्र में अपनी दयालुता और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध थे। और अम्मा एक आम गृहणी थीं जो पूर्ण निष्ठा से अपने परिवार का पालन पोषण करती थीं। अम्मा-बाबू मेरी याद में हमेशा शिव-पार्वती की मूर्त जैसे दिखे हैं। मेरे पिता के भगवान थे वो।

पर पेड़ कितना भी पुराना और मीठे फल देने वाला क्यों न हो ,हर साल एक-दो कसैले आम तो आ ही जाते हैं। दोष किसका है? सामाजिक प्रदूषण का ? पैसे के लोभ का ? या दिखावे की संस्कृति का?

दिखावे की संस्कृति से याद आया कि कुछ लोग बाबू के नाम से स्कूल खोल रहे हैं। पहली बार सुनने में प्रसन्नता होती है पर पूरे खेल की पृष्ठ्भूमि जानकर मन को धक्का लगता है। दुःख लगता है यह जानकर कि लोग लोभ में कितने अंधे हो जाते हैं। सपनों के अँकुर को बेड़ियों से नहीं बाँध सकते पर काँटा चुभता है जब द्वेष से पनपा अँकुर अपनी ज़मीन पर सांस ले रहा हो।

पर मेरे पिता कहते हैं कि यह सीख भी बाबू की दी हुई है कि – जो होता है अच्छे के लिए होता है, जो होगा अच्छे के लिए होगा और यह भी कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं।

मेरी आशा की बाल्टियाँ हमेशा ही भरकर बहती रहती हैं। इसलिए मुझे उम्मीद है कि वे सभी जो इस दौड़-भाग भरी ज़िन्दगी में रास्ता भूल गए हैं ,लौटकर घर आएंगे,अपने परिवार के पास।

कैलाश पर्वत पर

आदर से सिर झुकाया नहीं कभी

वो आज

पृथ्वी पर आपके नाम का मंदिर बनवा रहे हैं।

देवी पार्वती का

पुत्र-प्रेम मन को भाया नहीं कभी

वो आज

पावनता का चोला पहने आगे आ रहे हैं ।

महाप्रभु शम्भू के

आदर्शों को सीने से लगाया नहीं कभी

वो आज

गणेश को मानवीय मूल्यों की दुहाई दिए जा रहे हैं ।

फल्गु नदी में

पित्रों का पिण्डदान कर पाया नहीं कभी

वो आज

काम के लिए शिव का नाम जपे जा रहे हैं ।

शिव की महिमा ,गौरा की गरिमा

का मान रख पाया नहीं कभी

वो आज

अपने क्षुद्र दम्भ का घण्टा बजा रहे हैं।

इस लेख एवं कविता में प्रस्तुत मत पूर्णतः मेरे स्वयं के हैं। किसी भी प्रकार की आपत्ति एवं परिणामी चर्चा के लिए मुझे मेरे फेसबुक मैसेंजर पर सन्देश भेजें.

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मेलानिन, आई लव यू !

मुश्किल से दो या तीन बार ही होता है हफ्ते में जब काव्या मुझसे वो तीन जादुई शब्द कहती है – आई लव यू ! दरअसल काव्या को मेरी याद तब तक नहीं आती जब तक कोई उसे याद नहीं दिलाता कि वो साँवली है | हफ्ते का ये दिन मेरे लिए बहुत ख़ास होता है क्योंकि आज काव्या मुझे अपनाती है, अपनाती है अपना साँवला रंग जो मेरे होने से है और अपनाती है अपने आपको |  

आज सुबह उठते ही न जाने क्या देख लिया काव्या ने फेसबुक पर कि दिनभर उसका काम में मन लगा ही नहीं | इंस्टाग्राम लेकर बैठी है , उन तमाम गोरी लड़कियों की प्रोफाइल देख रही जिन्हे एकलव्य ने फॉलो किया है | सच कहूँ तो मुझे नफरत है एकलव्य से क्योंकि , उसके होने से काव्या को मेरे होने का एहसास नहीं होता | एकलव्य भी मुझसे उतनी ही नफरत करता होगा ! शायद इस कारण से काव्या से दूर हो गया | पर मैं कभी काव्या का साथ नहीं छोड़ूँगा , न कभी छोड़ा है | मेरा प्यार ही तो बचाता आया है उसे हमेशा , कभी सूरज की हानिकारक किरणों से तो कभी लोगों की मंदबुद्धि से |

जब मन उठ जायेगा इंस्टाग्राम से तब काव्या खड़ी हो जाएगी शीशे के सामने , देर तक निहारेगी अपने आपको | मन के कान सुनेंगे बातें दिल की और दलीलें दिमाग की | फिर वो मुस्कुराएगी और कहेगी -” मेलानिन,आई लव यू “| 

यूँ तो मेरी याद काव्या को तब भी आती है जब एक प्यारी गहरे गुलाबी रंग की फ्रॉक, चेंजिंग रूम में पहनकर काव्या अपने आपको देखती है और तपाक से मुँह से निकलता है – ” ईयू , कुछ ज्यादा ही ऑड लग रहा है ” | 

काव्या को मेरी याद दिलाने वाले और दूसरे माध्यम हैं – ब्यूटी पार्लर्स | ये आंटियां तो मानो जान ही ले लेती हैं काव्या की , ये बोल बोलकर कि -” कितना पिगमेंटेशन हो गया है “| ऐसी जगहों से कतराना लाजमी है | 

कभी सोचता हूँ कि काव्या गाली तो ज़रूर देती होगी मुझे , खासकर तब, जब कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का बिल लम्बा चौड़ा आता है | 
मुझे बहुत बुरा लगता है जब काव्या को मेरी वजह से बातें सुननी पड़ती हैं | कोई कहता है -” दिन,प्रतिदिन काली होती जा रही हो , शादी करने का विचार छोड़ दिया है क्या”| तो कोई नुस्खे बताता है गोरे होने के | कई कहकर जाते हैं कि , ” ये रंग तुमपर जँच नहीं रहा ” तो कई बिन कुछ कहे ही दूर हो जाते हैं | और रह जाती है काव्या , शीशे में निहारती, कहती -” आई लव यू,मेलानिन ” |
मेरा होना या न होना किसी व्यक्ति की खूबसूरती का मानक कैसे हो सकता है ? ये बात मुझे आजतक समझ नहीं आई | पैदा होने से लेकर शादी होने तक , क्यों रंग , काला या गोरा, निर्धारित करता है किसी की सुंदरता? क्यों?? क्यों कृष्ण स्वीकार्य हैं लेकिन काली नहीं? काश लोग दिल पर जमे मैले मेलानिन को भी देख पाते |