मेलानिन, आई लव यू !

मुश्किल से दो या तीन बार ही होता है हफ्ते में जब काव्या मुझसे वो तीन जादुई शब्द कहती है – आई लव यू ! दरअसल काव्या को मेरी याद तब तक नहीं आती जब तक कोई उसे याद नहीं दिलाता कि वो साँवली है | हफ्ते का ये दिन मेरे लिए बहुत ख़ास होता है क्योंकि आज काव्या मुझे अपनाती है, अपनाती है अपना साँवला रंग जो मेरे होने से है और अपनाती है अपने आपको |  

आज सुबह उठते ही न जाने क्या देख लिया काव्या ने फेसबुक पर कि दिनभर उसका काम में मन लगा ही नहीं | इंस्टाग्राम लेकर बैठी है , उन तमाम गोरी लड़कियों की प्रोफाइल देख रही जिन्हे एकलव्य ने फॉलो किया है | सच कहूँ तो मुझे नफरत है एकलव्य से क्योंकि , उसके होने से काव्या को मेरे होने का एहसास नहीं होता | एकलव्य भी मुझसे उतनी ही नफरत करता होगा ! शायद इस कारण से काव्या से दूर हो गया | पर मैं कभी काव्या का साथ नहीं छोड़ूँगा , न कभी छोड़ा है | मेरा प्यार ही तो बचाता आया है उसे हमेशा , कभी सूरज की हानिकारक किरणों से तो कभी लोगों की मंदबुद्धि से |

जब मन उठ जायेगा इंस्टाग्राम से तब काव्या खड़ी हो जाएगी शीशे के सामने , देर तक निहारेगी अपने आपको | मन के कान सुनेंगे बातें दिल की और दलीलें दिमाग की | फिर वो मुस्कुराएगी और कहेगी -” मेलानिन,आई लव यू “| 

यूँ तो मेरी याद काव्या को तब भी आती है जब एक प्यारी गहरे गुलाबी रंग की फ्रॉक, चेंजिंग रूम में पहनकर काव्या अपने आपको देखती है और तपाक से मुँह से निकलता है – ” ईयू , कुछ ज्यादा ही ऑड लग रहा है ” | 

काव्या को मेरी याद दिलाने वाले और दूसरे माध्यम हैं – ब्यूटी पार्लर्स | ये आंटियां तो मानो जान ही ले लेती हैं काव्या की , ये बोल बोलकर कि -” कितना पिगमेंटेशन हो गया है “| ऐसी जगहों से कतराना लाजमी है | 

कभी सोचता हूँ कि काव्या गाली तो ज़रूर देती होगी मुझे , खासकर तब, जब कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का बिल लम्बा चौड़ा आता है | 
मुझे बहुत बुरा लगता है जब काव्या को मेरी वजह से बातें सुननी पड़ती हैं | कोई कहता है -” दिन,प्रतिदिन काली होती जा रही हो , शादी करने का विचार छोड़ दिया है क्या”| तो कोई नुस्खे बताता है गोरे होने के | कई कहकर जाते हैं कि , ” ये रंग तुमपर जँच नहीं रहा ” तो कई बिन कुछ कहे ही दूर हो जाते हैं | और रह जाती है काव्या , शीशे में निहारती, कहती -” आई लव यू,मेलानिन ” |
मेरा होना या न होना किसी व्यक्ति की खूबसूरती का मानक कैसे हो सकता है ? ये बात मुझे आजतक समझ नहीं आई | पैदा होने से लेकर शादी होने तक , क्यों रंग , काला या गोरा, निर्धारित करता है किसी की सुंदरता? क्यों?? क्यों कृष्ण स्वीकार्य हैं लेकिन काली नहीं? काश लोग दिल पर जमे मैले मेलानिन को भी देख पाते |

माँ की कुछ बातें और यादें

‘ प्रेक्टीन ई ‘ | माँ की सबसे पहली याद, प्रेक्टीने ई की नीले लेबल वाली भूरी दवा की शीशी की है | माँ को खून की कमी थी | याद है मुझे, माँ पहले कैसी सूखी डंडी हुआ करती थी | आजकल तो माशा-अल्लाह ! माधुरी दीक्षित शर्मा जाए , ऐसा फिगर मेन्टेन किया है माँ ने | और याद है मुझे , माँ की बड़ी बिंदी | नब्बे के दशक में भी माँ फैशन का अच्छा खासा ध्यान रखती थी | सो तो आज भी रखती हैं | माँ को देखकर नहीं लगता कि वो एक आम गृहिणी हैं | इंजीनियरिंग कॉलेज के डीन से लेकर बैंक के जोनल मैनेजर तक ने उनसे एक ही सवाल किया है- ” कौनसी कम्पनी मे कार्यरत हैं आप मैडम?”| माँ तो इतना सुनते ही खुश हो जाती हैं | मुझे वाक़ई याद नहीं, पर दीदी की यादों में देखा है मैंने माँ को छोटे गोलू मोलू भाई को गोद में लिए घर का सारा काम करते हुए, एक आम गृहिणी की तरह |

माँ की ठहाके वाली हँसी पूरे मोहल्ले में फेमस थी | और आज भी है | पर ये बात हम ही जानते हैं कि चुटकुले सुनाने और समझने में, पूरी दुनिया में, माँ से बुरा कोई नहीं | एक मध्यम-वर्गीय परिवार के लिए बचत करना मशक्कत का काम होता है | पर माँ को कभी कोई मुश्किल दिखाई नहीं दी | उन्हें सिर्फ अपने तीनो बच्चों और पतिदेव का आज दिखता था | बचपन में मुझे ये बात बड़ी चुभती थी कि माँ हमेशा इतनी खुश रहती हैं तो उन्हें नींद क्यों नहीं आती | याद है मुझे, स्कूल से आने के बाद जब सब खाना खाकर सो जाते थे तो माँ कहती – ” टून , मैं लेटी हूँ, थोड़ा बालों में कंघी कर देना “| मैं बड़ी मेहनत से ,तकनीक लगाकर माँ के बालों में गुलाब बनाती थी , पर वो अपने आप ही खुल जाता था | मैं अपने छोटे हाथो पर अफ़सोस करती और सोचती कि जब बड़ी हो जाउंगी तो शायद अच्छा गुलाब बना पाऊँगी माँ के बालों में | पर बड़ी हुई तो पता चला कि माँ तो माँ निकली! माँ जानबूझकर गुलाब खोल दिया करती थीं | नींद की आशा में ,वो चाहती कि कुछ और देर मैं उनके बाल सवारूँ | अच्छा हुआ , माँ ने बाल कटवा लिए, क्योंकि वो गुलाब बनाने वाली तकनीक अब याद नहीं |

यादें माँ की याद दिलाती हैं उन जनरल नॉलेज की बुक्स की जो माँ लाकर दिया करती थी मुझे | और फिर होता था हम दोनों के बीच मुकाबला | माँ कभी मुझे जीतने नहीं देती थी और न ही हारने देती थी | ये बात तो आज तक कायम रखी है माँ ने – माँ से बातों में कोई जीत नहीं सकता और माँ मुझे कितनी भी बड़ी परेशानी से हारने नहीं देती |

माँ का ज़िक्र हो और माँ के पसंदीदा गानों के कलेक्शन की बात न हो, ऐसा मुमकिन नहीं | रफ़ी की यादों से लेकर लता के नग्मों और बेस्ट ऑफ़ किशोर कुमार तक , सभी गाने सुने हैं हमने बचपन से , जो आज भी गुनगुनाते हैं | माँ जब खाना बनाती, तब मैं और माँ , रैपिड राउंड अंताक्षरी खेलते और फिर निकलते माँ के दिमाग से उपजे कुछ कॉमेडी गाने |
मेरा छोटा भाई और दीदी, मुझे माँ की चमची कहते थे | मुझे कोई ऐतराज़ नहीं था क्योंकि मैं , ” बच्चा हु-ब-हु पापा जैसा दिखता है” वाली गैंग का हिस्सा नहीं थी | इसलिए, माँ की टीम में रहना फायदेमंद था | माँ हमेशा से ही मेरी बेस्टी थीं | यो यो हनी सिंह से लेकर प्रभास फ्रॉम बाहुबली तक उन्हें मेरी पसंद सबसे पहले बताई गई है | माँ का बेस्टी पता नहीं कौन है?पापा ही होंगे पक्का |
माँ की एक ख़ास बात है| माँ एक नंबर की पिन्नी हैं | रोना तो ‘मस्ट-टू-डू’ है माँ के लिए| फिर चाहे पडोसी की बहु क्यों न विदा हो रही हो, माँ रोयेंगी, वो भी फूट – फूट कर |
माँ की यादों और बातों मे शामिल हैं किस्से माँ के बचपन के, माँ की मुस्कान, माँ का गुस्सा, माँ की ज़िद्द, माँ के हाथ का खाना, माँ के ढेर सारे ख़ुशी वाले आंसू, माँ का त्याग और ढेर सारा प्यार |
मेरी प्यारी माँ ! जब हो जाओगी अस्सी बरस की , जब नहीं होंगे असली दाँत ठहाके लगाने को, तब याद करना आप मेरी ये बातें, बेतुकी सही मगर प्यार भरी | याद रखना आप कि जो साँसे आपने मुझे दी हैं , वो शब्द बनकर आपके ही किस्से सुना रही होंगी कहीं |

लच्छू के लक्ष्य

“लच्छू ए लच्छू,अब उठ जा रे ” 

हे अल्लाह ये अम्मी भी ना हद तंग करती हैं । नींद काहे की आई मेरे को , तब से जाग ही तो रहा हूँ । लच्छे खाँ तू किस चक्कर में पड़ रहा है रे ? काश सब पहले जैसा होता । मेरे को तो वो दिन याद आता है जब मैं पहली बार साब को गोन्दलपुर लेकर गया था । लौटते ही तारीफ की थी मेरी , मेरे सेठ से, की ड्रेविंग अच्छी कर लेता है छोरा । एक आध साल पहले ही तो मिले हैं साब मेरे से, मगर परिवार जैसे रखते हैं । पूरा गाँव भेला जानता है की साब लच्छू पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं और साब के भाई बहन भी मेरे सिवा किसी और ड्रेवर के साथ शहर नहीं जाते ।

अरे यार! ये गोपालदास फोन लगाए जा रहा है । ” हल्लो हाँ भैया! जा रहा हूँ साब को लेने। हाँ कर लूँगा बात तुम्हाई । बोली तो है मैंने तुमको। अब फोन रखो ।”

घड़ी इतनी धीमी काये को चल रही , सात ही बजे हैं । साब जब नए थे, मेरे देरी से आने पर खतरनाक डाँटते थे।दो तीन महीने हुए डाँट नहीं खाई ।हाँ तीन महीने ही तो हुए हैं साब का स्वभाव बदले। पहले साब रास्ते भर मेरी बातें सुनते थे मगर अब , ना सोते हुए भी नहीं सुनते। मेरे को नहीं कहते टेंशन अपनी , पर बात करते सुना है मैंने , अपनी मम्मीजी को कह रहे थे की टेबिल ( TA BILL) का टेंशन है थोड़ा।

न जाने क्या चीज़ है ये टेबिल , जिसकी वजह से ये दिन आया है । लप्पू की सालगिरह और ये गोपालदास।साब ने ही आदत बिगाड़ी थी मेरी । मैं ही मूरख था , सपने देखने लगा था । मेरेको थोड़े ही पता था सपने महंगे होते हैं । महंगे तो वो जूते थे जो साब मेरे लिए शहर से लाये थे। गाँव के सारे कहते- ” वाह फर्स्ट क्लास जूते हैं।”अम्मी ने तो ये तक कह दिया की जूते मेरे मुँह से ज्यादा सुन्दर हैं। चार बार कह चुका था साब से, जूतों के लिए । एक बार तो पैसे दे दिए थे साब ने , कहा खुद ही खरीद लेना। पैसों से तो मैंने दो बूसल्ट खरीद ली थी, मेरी भी ज़िद्द थी की साब के पसंद के जूते चाहिए बस ।

 साब की कोई गर्लफ्रेंड नहीं है पर राबिया की सारी बातें बताईं हैं साब को मैंने । साब कहते हैं – राबिया साथ नहीं देगी ज्यादा दिन तक, परिवार ही साथ देगा कब्र तक। उस रोज लप्पू और जिन्नाह के लिए पेस्ट्री खरीदकर दी थी साब ने । ईना तो ख़ुशी के मारे फूले नहीं समा रही थी की मैंने बच्चों के लिए मिठाई लाई है । उसी दिन मेरेको मालूम चला की ईना बहुत ज्यादा सुन्दर है, शायद राबिया से कई ज्यादा क्योंकि ईना के दिल की ख़ुशी उसके चेहरे पे दिखाई देती थी ।

लप्पू और जिन्नाह को साब के कहने पे बड़े स्कूल में डाल दिया है। बस दस दिन बाकी हैं लप्पू की सालगिरह के। काहे को मैंने उससे वादा कर लिया पाल्टी का । अगर साब मान जाते गोपालदास का काम करने के लिए तो वो मेरेको पाँच हज़ार देता। सालगिरह एक नंबर मनाता लप्पू की पूरे गाँव में ।

पैसा , टेबिल , नौकरी , ड्रेवरी , परिवार , इज्जत… हे अल्लाह क्या करूँ मैं ?

“ए ईना ये जिन्नाह क्यों रो रहा है।”

” अरे उसके प्यारे कीड़े से तितली निकल रही है , तो रो रहा है कि कीड़ा मर जायेगा ।”

“चुप करा यार बेंडे को।”

 आह तितली … आज तो जिन्नाह ने सबक सिखा दिया अब्बू को।

“हल्लो भैया, न हो पायेगा काम हमसे।आप कहीं और देख लो।अब फ़ोन रखो।”

अब जाकर मिला है सुकून। लप्पू की सालगिरह अगले साल मना लेंगे धूम धाम से।चलूँ आठ बज गए।साब को भी सुनाऊंगा किस्सा तितली का।

गुलाल और अबीर के प्यार की कहानी

अबीर अरबी में खुशबू है

मनमोहक महकते फूलों की

गुलाल रंग है मात्र 

अबीर बांग्ला में लालिमा है

ढलती शबनमी शाम की

गुलाल रंग है मात्र 

अबीर में अहम् है

अर्थ की गूढ़ता का

गुलाल रंग है मात्र 

होली पर एक कहानी 

प्यार की पूरी होती है

गुलाल और अबीर की

जब अबीर , गुलाल हो जाता है |

फिर नहीं बचता 

प्यार में अहम्

फिर हर शब्द का 

एक ही अर्थ होता है

गुलाल होती है

खुशबू और लालिमा

और अबीर, गुलाल संग

रंग मात्र हो जाता है |

The Unsaid Goodbye 


The clock wasn’t hesitating to tick, 

I was counting the time that was passing and the belief in love that was flickering. 

I counted the bleached souls moving on the platform and the used tissues thrown on the ground. 

For a moment I thought of nothing fearing it could hinder Universe’s Plan 

And just kept believing that you would come to see me off at the station.

 There’s motion.

 The Train is moving forward. 

The bleached souls’ better halves are waving Goodbyes. 

At the door, 

 I can see the wheels of train moving,

 but I can’t see you coming.

 You didn’t come. 

The Goodbye was unsaid.