माँ की कुछ बातें और यादें

‘ प्रेक्टीन ई ‘ | माँ की सबसे पहली याद, प्रेक्टीने ई की नीले लेबल वाली भूरी दवा की शीशी की है | माँ को खून की कमी थी | याद है मुझे, माँ पहले कैसी सूखी डंडी हुआ करती थी | आजकल तो माशा-अल्लाह ! माधुरी दीक्षित शर्मा जाए , ऐसा फिगर मेन्टेन किया है माँ ने | और याद है मुझे , माँ की बड़ी बिंदी | नब्बे के दशक में भी माँ फैशन का अच्छा खासा ध्यान रखती थी | सो तो आज भी रखती हैं | माँ को देखकर नहीं लगता कि वो एक आम गृहिणी हैं | इंजीनियरिंग कॉलेज के डीन से लेकर बैंक के जोनल मैनेजर तक ने उनसे एक ही सवाल किया है- ” कौनसी कम्पनी मे कार्यरत हैं आप मैडम?”| माँ तो इतना सुनते ही खुश हो जाती हैं | मुझे वाक़ई याद नहीं, पर दीदी की यादों में देखा है मैंने माँ को छोटे गोलू मोलू भाई को गोद में लिए घर का सारा काम करते हुए, एक आम गृहिणी की तरह |

माँ की ठहाके वाली हँसी पूरे मोहल्ले में फेमस थी | और आज भी है | पर ये बात हम ही जानते हैं कि चुटकुले सुनाने और समझने में, पूरी दुनिया में, माँ से बुरा कोई नहीं | एक मध्यम-वर्गीय परिवार के लिए बचत करना मशक्कत का काम होता है | पर माँ को कभी कोई मुश्किल दिखाई नहीं दी | उन्हें सिर्फ अपने तीनो बच्चों और पतिदेव का आज दिखता था | बचपन में मुझे ये बात बड़ी चुभती थी कि माँ हमेशा इतनी खुश रहती हैं तो उन्हें नींद क्यों नहीं आती | याद है मुझे, स्कूल से आने के बाद जब सब खाना खाकर सो जाते थे तो माँ कहती – ” टून , मैं लेटी हूँ, थोड़ा बालों में कंघी कर देना “| मैं बड़ी मेहनत से ,तकनीक लगाकर माँ के बालों में गुलाब बनाती थी , पर वो अपने आप ही खुल जाता था | मैं अपने छोटे हाथो पर अफ़सोस करती और सोचती कि जब बड़ी हो जाउंगी तो शायद अच्छा गुलाब बना पाऊँगी माँ के बालों में | पर बड़ी हुई तो पता चला कि माँ तो माँ निकली! माँ जानबूझकर गुलाब खोल दिया करती थीं | नींद की आशा में ,वो चाहती कि कुछ और देर मैं उनके बाल सवारूँ | अच्छा हुआ , माँ ने बाल कटवा लिए, क्योंकि वो गुलाब बनाने वाली तकनीक अब याद नहीं |

यादें माँ की याद दिलाती हैं उन जनरल नॉलेज की बुक्स की जो माँ लाकर दिया करती थी मुझे | और फिर होता था हम दोनों के बीच मुकाबला | माँ कभी मुझे जीतने नहीं देती थी और न ही हारने देती थी | ये बात तो आज तक कायम रखी है माँ ने – माँ से बातों में कोई जीत नहीं सकता और माँ मुझे कितनी भी बड़ी परेशानी से हारने नहीं देती |

माँ का ज़िक्र हो और माँ के पसंदीदा गानों के कलेक्शन की बात न हो, ऐसा मुमकिन नहीं | रफ़ी की यादों से लेकर लता के नग्मों और बेस्ट ऑफ़ किशोर कुमार तक , सभी गाने सुने हैं हमने बचपन से , जो आज भी गुनगुनाते हैं | माँ जब खाना बनाती, तब मैं और माँ , रैपिड राउंड अंताक्षरी खेलते और फिर निकलते माँ के दिमाग से उपजे कुछ कॉमेडी गाने |
मेरा छोटा भाई और दीदी, मुझे माँ की चमची कहते थे | मुझे कोई ऐतराज़ नहीं था क्योंकि मैं , ” बच्चा हु-ब-हु पापा जैसा दिखता है” वाली गैंग का हिस्सा नहीं थी | इसलिए, माँ की टीम में रहना फायदेमंद था | माँ हमेशा से ही मेरी बेस्टी थीं | यो यो हनी सिंह से लेकर प्रभास फ्रॉम बाहुबली तक उन्हें मेरी पसंद सबसे पहले बताई गई है | माँ का बेस्टी पता नहीं कौन है?पापा ही होंगे पक्का |
माँ की एक ख़ास बात है| माँ एक नंबर की पिन्नी हैं | रोना तो ‘मस्ट-टू-डू’ है माँ के लिए| फिर चाहे पडोसी की बहु क्यों न विदा हो रही हो, माँ रोयेंगी, वो भी फूट – फूट कर |
माँ की यादों और बातों मे शामिल हैं किस्से माँ के बचपन के, माँ की मुस्कान, माँ का गुस्सा, माँ की ज़िद्द, माँ के हाथ का खाना, माँ के ढेर सारे ख़ुशी वाले आंसू, माँ का त्याग और ढेर सारा प्यार |
मेरी प्यारी माँ ! जब हो जाओगी अस्सी बरस की , जब नहीं होंगे असली दाँत ठहाके लगाने को, तब याद करना आप मेरी ये बातें, बेतुकी सही मगर प्यार भरी | याद रखना आप कि जो साँसे आपने मुझे दी हैं , वो शब्द बनकर आपके ही किस्से सुना रही होंगी कहीं |

लच्छू के लक्ष्य

“लच्छू ए लच्छू,अब उठ जा रे ” 

हे अल्लाह ये अम्मी भी ना हद तंग करती हैं । नींद काहे की आई मेरे को , तब से जाग ही तो रहा हूँ । लच्छे खाँ तू किस चक्कर में पड़ रहा है रे ? काश सब पहले जैसा होता । मेरे को तो वो दिन याद आता है जब मैं पहली बार साब को गोन्दलपुर लेकर गया था । लौटते ही तारीफ की थी मेरी , मेरे सेठ से, की ड्रेविंग अच्छी कर लेता है छोरा । एक आध साल पहले ही तो मिले हैं साब मेरे से, मगर परिवार जैसे रखते हैं । पूरा गाँव भेला जानता है की साब लच्छू पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं और साब के भाई बहन भी मेरे सिवा किसी और ड्रेवर के साथ शहर नहीं जाते ।

अरे यार! ये गोपालदास फोन लगाए जा रहा है । ” हल्लो हाँ भैया! जा रहा हूँ साब को लेने। हाँ कर लूँगा बात तुम्हाई । बोली तो है मैंने तुमको। अब फोन रखो ।”

घड़ी इतनी धीमी काये को चल रही , सात ही बजे हैं । साब जब नए थे, मेरे देरी से आने पर खतरनाक डाँटते थे।दो तीन महीने हुए डाँट नहीं खाई ।हाँ तीन महीने ही तो हुए हैं साब का स्वभाव बदले। पहले साब रास्ते भर मेरी बातें सुनते थे मगर अब , ना सोते हुए भी नहीं सुनते। मेरे को नहीं कहते टेंशन अपनी , पर बात करते सुना है मैंने , अपनी मम्मीजी को कह रहे थे की टेबिल ( TA BILL) का टेंशन है थोड़ा।

न जाने क्या चीज़ है ये टेबिल , जिसकी वजह से ये दिन आया है । लप्पू की सालगिरह और ये गोपालदास।साब ने ही आदत बिगाड़ी थी मेरी । मैं ही मूरख था , सपने देखने लगा था । मेरेको थोड़े ही पता था सपने महंगे होते हैं । महंगे तो वो जूते थे जो साब मेरे लिए शहर से लाये थे। गाँव के सारे कहते- ” वाह फर्स्ट क्लास जूते हैं।”अम्मी ने तो ये तक कह दिया की जूते मेरे मुँह से ज्यादा सुन्दर हैं। चार बार कह चुका था साब से, जूतों के लिए । एक बार तो पैसे दे दिए थे साब ने , कहा खुद ही खरीद लेना। पैसों से तो मैंने दो बूसल्ट खरीद ली थी, मेरी भी ज़िद्द थी की साब के पसंद के जूते चाहिए बस ।

 साब की कोई गर्लफ्रेंड नहीं है पर राबिया की सारी बातें बताईं हैं साब को मैंने । साब कहते हैं – राबिया साथ नहीं देगी ज्यादा दिन तक, परिवार ही साथ देगा कब्र तक। उस रोज लप्पू और जिन्नाह के लिए पेस्ट्री खरीदकर दी थी साब ने । ईना तो ख़ुशी के मारे फूले नहीं समा रही थी की मैंने बच्चों के लिए मिठाई लाई है । उसी दिन मेरेको मालूम चला की ईना बहुत ज्यादा सुन्दर है, शायद राबिया से कई ज्यादा क्योंकि ईना के दिल की ख़ुशी उसके चेहरे पे दिखाई देती थी ।

लप्पू और जिन्नाह को साब के कहने पे बड़े स्कूल में डाल दिया है। बस दस दिन बाकी हैं लप्पू की सालगिरह के। काहे को मैंने उससे वादा कर लिया पाल्टी का । अगर साब मान जाते गोपालदास का काम करने के लिए तो वो मेरेको पाँच हज़ार देता। सालगिरह एक नंबर मनाता लप्पू की पूरे गाँव में ।

पैसा , टेबिल , नौकरी , ड्रेवरी , परिवार , इज्जत… हे अल्लाह क्या करूँ मैं ?

“ए ईना ये जिन्नाह क्यों रो रहा है।”

” अरे उसके प्यारे कीड़े से तितली निकल रही है , तो रो रहा है कि कीड़ा मर जायेगा ।”

“चुप करा यार बेंडे को।”

 आह तितली … आज तो जिन्नाह ने सबक सिखा दिया अब्बू को।

“हल्लो भैया, न हो पायेगा काम हमसे।आप कहीं और देख लो।अब फ़ोन रखो।”

अब जाकर मिला है सुकून। लप्पू की सालगिरह अगले साल मना लेंगे धूम धाम से।चलूँ आठ बज गए।साब को भी सुनाऊंगा किस्सा तितली का।