ग्वालियर …शहर जो छूटता नहीं

हर शहर की अपनी खुशबू होती है, अपनी छाप होती है। नदियों ,मैदानों,फसलों ,फूलों,संस्कृतियों और विरासतों से आती ये खुशबू एक शहर की आत्मा का अभिन्न अंग होती है। और यही खुशबू हम पर्यटकों को अपने करीब खींचती है। ऋषि गालव का नगर ग्वालियर , सिर्फ पर्यटकों को मोहता नहीं है ,ग्वालियर उन सबके हृदयों पर एक अमिट छाप छोड़ जाता है। मेरा मानना है कि ग्वालियर वो शहर है जो छूटता नहीं है, वह आपके मन के उस कोने में जाकर बस जाता है ,जहाँ से उसे दूर करना नामुमकिन है। स्वागत है आप सभी का , ऋषि गालव के शहर ,तानसेन-नगरी और मध्यप्रदेश की पर्यटन-राजधानी , ग्वालियर में !

ग्वालियर छोड़ने के दो साल बाद ,स्टीयरिंग व्हील फिर से ग्वालियर की ओर घूम गया है। सुबह के छः बज रहे हैं और उस भीनी सी खुशबू ने नींद खोल दी है। शहर के बाहरी हिस्से में बने वो अभियांत्रिकी महाविद्यालय और गाड़ियों के शोरूम और शहर के अंदर बने और बसे वो पुराने घर , छोटी गलियाँ ,चौड़ी सड़कें और ग-वालियर निवासी। फूलबाग से गुज़रते हुए दूर किले के पीछे से उगता सूरज दिखाई दिया। क्या शानदार नज़ारा था! होटल में चेक-इन करने के बाद हम अपने उन दोस्तों से मिलने गए , जो ग्वालियर के ही होकर रह गए हैं।नाश्ता तो पहले से ही तय था कि एस एस कचौड़ीवाले के समोसे-बेड़ई-जलेबी खाना है , बस !

मन के पेट की भूक को तृप्त कर हम निकल गए अपने पहले पड़ाव की ओर जो था – ग्वालियर का किला !

ग्वालियर का किला , भारत में मशहूर और महत्वपूर्ण किलों में से एक है। भारत में फलने-फूलने और राज करने वाले विभिन्न राजवंशों और सल्तनतों का प्रमाण है ग्वालियर का किला। अद्वितीय वास्तुकला,अदम्य विशालता ,अपार सौन्दर्य और कुछ अनसुलझे रहस्य,ग्वालियर के किले को पर्यटकों की आँखों का तारा बना देते हैं।

किले तक पहुंचने के लिए, हमने गाड़ी फसने के डर से ग्वालियर-गेट का त्याग किया, जो की शहर के बीचों-बीच था और ऊरवाई गेट से किले के भीतर प्रवेश किया।

शुरुआत हमने दाता बंदी छोड़ गुरूद्वारे से की। सिखों के छठवें गुरु हरगोविंद सिंह की याद में बना ये गुरुद्वारा प्रतीक है बलिदान,प्रतिष्ठा और सामंजस्य का। कहते है गुरूद्वारे के नाम के पीछे की कहानी ये है कि गुरु हरगोविंद सिंह जी ने जहाँगीर से अपनी रिहायी के समय , पचास अन्य बंदी राजाओं को मुक्त कराया था, इसके अलावा अन्य कई कहानियाँ हैं। क्या बेहतरीन स्वच्छता का प्रबन्ध होता है गुरूद्वारे में ! जूतों की रैक पर मेहनत करते स्वेच्छाकर्मियों और सिर पर रुमाल बाँधने वाले उन बुजुर्ग को देखकर समझ आ गया था कि गुरूद्वारे के अंदर कितनी शान्ति होगी। गुरूद्वारे की सुंदरता को अच्छे से निहारने के बाद , मन में एक अजीब सी शान्ति और आशा लिए हम आगे बढ़े।

मैं ख़ुशनसीब हूँ जो मेरी टोली घुम्मक्कड़ों से भरी है। तो हम यूँ ही घूमते- टहलते पहुँच गए उस जगह जो कुछ ख़ास थी। ख़ास इस मायने में कि ये वही तस्वीर है जो ग्वालियर-फ़ोर्ट सुनते ही दिमाग में चित्रित होती है। वो पीले पत्थरों से बानी ऊँची इमारतों पर नीले चित्र। यह नज़ारा जो हम सब अपनी आँखों में समेटने की कोशिश कर रहे थे , मानसिंह महल , मानमंदिर महल , भूलभुलैया या चित्त मंदिर कहलाता है।चार मंज़िला ये ईमारत, कभी राजपूतों का महल थी तो कभी मुगलों का कारागार। कलाप्रेमी राजा मानसिंह ने वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण इस भवन के रूप में अवतरित किया था। महल की दीवारों पर बनी कलाकृतियाँ ,न सिर्फ इतिहास की झलक प्रस्तुत कर रहीं थीं बल्कि जीवन और संस्कृति से जुड़े विभिन्न पहलुओं को उजागर कर रहीं थीं। राजशाही मुहर, चीनी ड्रैगन, रुद्राक्ष, विजयपताका इत्यादि का चित्रण और तक्षण ,संगीत समारोह आयोजित करने के लिए विशेष मंच ,यह सब देखकर हम सब अचंभित थे। भूमिगत तल्ला एक अजीब सी मनहूसियत से भरा हुआ था। बेहतरीन वातायन-व्यवस्था होने के बावज़ूद ,खूँटे और बंदियों की कहानियों से घुटन हो रही थी।

हम जल्द ही बाहर निकले और किले में स्थित अन्य इमारतों और उनसे जुड़े इतिहास का मुआयना करने लगे। करण महल,तेली का मंदिर,जौहर कुण्ड ,विक्रम महल और सनसेट पॉइन्ट , यह सब किले का हिस्सा होते हुए भी अपनी अलग अनूठी पहचान बता रहे थे। डूबता सूरज और फैलता ग्वालियर शहर ,बेहद खूबसूरत नज़ारा था ,हमारी आँखों के सामने। आज का आखरी पड़ाव था गूजरी महल ,जो राजा ने अपनी गूजरी रानी मृगनयनी के लिए ख़ास बनवाया था। रानी मृगनयनी ब्यूटी विद ब्रेन का अद्भुत उदाहरण थीं। गूजरी महल से निकलकर हम सभी लड़कियाँ बड़ा एम्पॉवर्ड महसूस कर रही थीं।

एक दिन काफी नहीं होता उस किले को देखने और समझने के लिए जिसने सोलह सदियाँ और न जाने कितने राजवंश देख डाले। टाइम मशीन से उतरकर हम वापस होटल के लिए निकल गए। रात को सोना है। कल के दिन सिंधिया राजवंश की विलासिता और जनकल्याण के दर्शन करने हैं। यानी जयविलास महल देखने जाना है। कल मिलते हैं , फिर , ग्वालियर की सैर पर।

सुबह उठकर किले की सुहानी यादों को ताज़ा कर ही रहे थे कि पेट की घड़ी ने ‘नाश्ता-टाइम’ का अलार्म बजा दिया। हम सबने स्नूज़ बटन दबाकर आज का सफर प्लान किया। टाइम-मशीन आज हमें सिंधिया परिवार की शानोशौकत दिखाने ले जाने वाली है।

नयाबाज़ार कम्पू के मशहूर अग्रवाल पोहा जलेबी खाकर हम निकल पड़े राजा-रजवाड़ों के जीवन की झलक देखने-जयविलास पैलेस की ओर।प्रवेश-शुल्क, कैमरा-शुल्क इत्यादि देकर ,मोबाइल और अन्य सामान लाकर्स में रखवाकर हम आगे बढ़े।

पहली नज़र में दूर से महल,एक ठेठ महाराष्ट्रियन बाड़ा लगा । लेकिन महल परिसर में प्रवेश करते ही पाश्चात्य वास्तुकला की अनूठता की अनुभूति हुई। तीन विभिन्न शैलियों में बना महल पूर्णतः श्वेत था। और महल की विशालता ,कहानी सुना रही थी महल के मुख्य आर्किटेक्ट माइकल फिलॉस की कार्यकुशलता और धैर्य की।

जयविलास महल के केवल एक हिस्से को ही म्यूजियम का रूप दिया गया है, बाकी हिस्सों में आमजन का प्रवेश वर्जित है। हिज़ हाइनेस महाराजा जयाजीराव सिंधिया के द्वारा निर्मित इस महल में प्रवेश करते ही सबसे पहले पेंटिंग्स द्वारा अवगत कराया जाता है सिंधिया राजवंश के राजाओं, राजमाताओं और राजकुमारों से।

आगे चलकर एक हॉल से दूसरे फिर तीसरे और ऐसे ही कई हॉल्स और गलियारों में दिखाई देती है राजशाही रौनक।

एक हॉल जो माधव राव सिंधिया को समर्पित है ,सजा हुआ है उनकी पेंटिंग्स,फोटोज़ ,क्रिकेट एवं गोल्फ किट ,नागरिक उड्डयन एवं रेलवे मंत्रालय के मोमेंटोज़ और मंत्री जी द्वारा दैनिक उपयोग में लायी जाने वाली वस्तुओं से , जो देखने से ही बेशकीमती लग रही थी जैसे पेन्स और लाइटर्स। माधव राव की एक अति विशाल पेंटिंग, बयाँ कर रही थी दास्ताँ उनकी अति उच्च जीवनशैली की।

एक हॉल शीशों से सजा था ,सिर्फ शीशों से ।और वहॉं एक विशाल झूला था जिसमे नंदगोपाल झूला झूल रहे थे। गलियारों में रखे थे अनेक मिनिएचर्स , जो कला के एक अलग आयाम का परिचय दे रहे थे। शादी में राजपरिवार द्वारा पहने गए वस्त्रों एवं आभूषणों से लेकर जंग में उपयोग में लाए जाने वाले छुरी,तलवार,बन्दूक, तोप एवं चेनमेल इत्यादि देखकर ऐसा लग रहा था , मानो हम किसी दूसरी गरीब ,छोटी और छीण दुनिया से आये हों। आभूषणों और अस्त्र-शस्त्रों की वैभव-विशालता देखकर हम दंग थे।

कई अन्य कमरे, विभिन्न राजा-रानियों को समर्पित थे ,जो समकालीन फर्नीचरों एवं साज-सामानों से सुसज्जित थे। और एक कमरा था नन्हें राजकुमारों का। आँगन सजा हुआ था वैगन्स,मोटर कार्स ,पालकियों ,बग्घियों एवं रथों से। साथ ही था एक सुन्दर फ़व्वारा और अनेक जानवरों की सुन्दर कलाकृतियाँ।

जय विलास महल का मुख्य आकर्षण है दरबार हॉल | कहते है इस कक्ष की मजबूती 12 हाथियों को चढ़ाकर जांची गयी थी | सिंधिया राजदरबार द्वारा विदेशी राजाओं का स्वागत इस कक्ष में किया जाता था , जो सजा था आलीशान एवं बेशकीमती फर्नीचरों से | कक्ष की दीवारों पर बेहद खुबसूरत कारीगरी थी जिसे सोने के पानी से रंगा गया था।एशिया का सबसे बड़ा कार्पेट, जो कि कई हज़ार बंदियों द्वारा बनाया गया था, दरबार हॉल की शोभा बढ़ा रहा था | सबसे पहली चीज़ जिसपर दरबार हॉल में धुसते ही नज़र जाती है , वो है विशाल-झूमर | इतना सुन्दर और इतना बड़ा | इतनी ख़ूबसूरती मेरे ह्रदय में समा ही नहीं पा रही थी , तो हमने राजशाही ठाठ का एक और चेहरा देखा , जो कुछ घिनौना था – एक बड़े पैमाने पर बाघों का शिकार । ये राजाओं के शौक भी अजीब होते थे | नहीं ?

बोनस : – विश्व प्रसिद्ध डाईनिंग हाल और ट्रेन :

शाकाहारी और मांसाहारी मेहमानों के लिए दो अलग विशाल टेबलें लगी हैं | मॉंस एवं मदिरा टेबल पर चलने वाली ट्रेनों से परोसे जाते हैं ।

मेरी बात मानिए! अगर ये सारे राजसी ठाठ-बाट देखकर किसी अजीब से सुखद आनंद की अनुभूति लेना चाहते हैं , तो दो दिन की छुट्टी मिलते ही ग्वालियर ज़रूर जाईये ।

Advertisements

हिन्दी,बिन्दी और बातें !

महाविद्यालय के हिन्दी विभाग से लेकर इंदिरा काॅलोनी के बडे़ गेट तक मैं ‘प्रोफेसर साहब’ होता  हूँ। और वहॉं से अपने घर की दहलीज़ तक ‘भट्ट साहब’ । घर के अंदर कदम रखते ही मैं ‘ए जी, सुनो जी’ हो जाता हूँ।  सच कहूँ तो अपनापन तब ही लगता है जब लोग आपको आपके ओहदे से नहीं बल्कि  प्यार से पुकारते हैं । दिन के चारों पहर, ‘ए जी सुनो जी’ सुनना ,ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया घूम लेने के बाद घर का बरामदा लगता है- कुछ अपना सा । अपनापन से याद आया कि मैंने  इस कहानी की महानायिका – मेरी पत्नी बेला का परिचय तो दिया ही नहीं। महादेवी दुर्गा के मस्तक पर टिकी ब्रह्मांड की बिंदी के समान ओजस्वी है मेरी पत्नी बेला । और उतनी ही ओजपूर्ण हैं उसकी बातें  । बात हो, गली के कुत्ते ‘ छोटू’ की चोटिल हो जाने की या फिर सिपाही बेला द्वारा बड़ी अलमारी के ऊपर से डिब्बे निकालने की, बेला हर मामूली सी बात को कान्स  फिल्मोत्सव में प्रदर्शित  होने वाली फिल्म की तरह रोचक बना देती है। एक बार डिस्कवरी चैनल देखते हुए मैंने यूं ही बेला से कह दिया था कि मूर्ख हैं वो लोग, जो चीन की दीवार को सबसे लम्बा और ऊँचा  मानते  हैं, उन्होंने कभी तुम्हारी बातें नहीं सुनी न ! मेरे व्यंग्यात्मक शब्दों का परिणाम, मेरी मूर्खता का प्रमाण  बन गया जब क्रोध में बेला ने अगले दो दिन टिफिन का डब्बा नहीं दिया।

इन्दिरा कालोनी में शिफ्ट होने के बाद यहाँ शादी जैसे किसी बड़े सार्वजनिक समारोह में सम्मलित होने का यह मेरा पहला अवसर था I लगभग पूरी सोसाइटी ही आमंत्रित थी I मेरी बमुश्किल तीन – चार लोगों से पहले भेंट हुई थी ,वह भी औपचारिक,इसलिए सभी औपचारिकताओं और परिचय के बाद मैं मूक दर्शक की भांति खड़ा हो गया था Iहम पुरुष वैसे भी गपशप के मामले में स्त्रियों से काफी पीछे हैं I मैं देख रहा था कि पत्नी बेला स्त्रियों के झुंड में काफी सक्रिय भूमिका अदा कर रही थी I

हुंह, चौबीस घंटे खाली बैठे रहने वालों को काम ही क्या है ? इधर उधर घूमना ,लगी बुझाई करना , वैसे भी इन स्त्रियों के पास बातों के अलावा और है ही क्या ? अक्सर मैं सोचता था कि बेला ने अपना व्हाट्सऐप ग्रुप भी बना रखा है , और दिनभर व्हाट्सऐप पर लगे रहने के बावजूद इनकी बातें ख़त्म  नहीं होती  और शायद ही यह कभी ख़त्म  होंगी ।

बेला के  नेतृत्व कौशल पर मुझे कभी कोई शक नहीं था पर आज स्त्रियों के झुण्ड में अपनी पत्नी को उभरता देख , गर्व महसूस हो रहा था। अनायास ही एक विचार आया कि बेला हू-ब-हू हिन्दी भाषा के समान है। जिस तरह हिन्दी , राष्ट्रभाषा का दर्जा पाने के लिए किसी आंतरिक संघर्ष का प्रयोग नहीं चाहती उसी प्रकार बेला  भी सामाजिक स्वीकृति की प्राप्ति की दौड़  में शामिल नहीं होती । बेला स्वयं अपना स्थान बनाना चाहती है, ठीक हिन्दी की तरह जिसे आवश्यकता नहीं है नारों और विज्ञापनों की । शर्मा जी ने कोहनी मारी, तो मैंने देखा कि किस तरह बेला मोबाईल में बेमतलब भिड़ी स्त्रियों को मंच पर ले जा रही है । मैंने चैन की साँस ली कि चलो , कुछ देर के लिए ही सही  ‘अपना प्यारा इंदिरा मोहल्ला’ नाम का वाट्सऐप ग्रुप  शाँत  रहेगा ।

फुर्सत मिली तो मैंने देखा कि शेयर मार्केट के उतार चढ़ाव  और सरकार की बेतुकी नीतियों की बातचीत करके अब सभी पुरूष ऊब चुके हैं और सबका ध्यान अब मंच की ओर है। यही अंतर है बस पुरुषों और स्त्रियों में – बातों को सहेजकर जारी रखने का हुनर , जो केवल भारतीय स्त्रियॉं ही कर सकती हैं ।

शादी-ब्याह के माहौल के उल्लास में वृद्धी  चौगुनी हो गई जब इंदिरा कालोनी के सबसे वरिष्ठ दंपत्ति – गुप्ताज़ मंच पर आए।मेरी प्रकृति के विपरीत, न जाने क्यों , मैं भी इन बेहूदे पलों का बेहद आनंद ले रहा था। यहाँ गुप्ताइन ने पहला ठुमका मारा ही था कि गुप्ताजी ने जो सीटी बजाई कि हम सभी वहीं खड़े खड़े लोटपोट हो गए। आज वातावरण कुछ अलग था। सदियों से काम के अभाव में खाली बैठी स्त्रियों की कौम आज अत्यंत व्यस्त थी। कोई नमक मिर्च वाली बातें नहीं , कोई इधर की उधर नहीं और न ही कोई मायके-ससुराल के दुखड़े। कुछ अलग ही दिन  था आज। अचानक बेला की कही एक बात याद आ गई कि ” भारत में सभी औरतों के सभी दिन एक समान होते हैं “| बेला आमतौर पर कुछ गलत नहीं कहती पर यह तो अतिश्योक्ति हो गई। चलो मान लेते हैं कि ये सच है कि औरतों के सभी दिन समान होते हैं , पर आज का दिन ? आज तो सभी औरतें बहुत खुश थीं। वैसे माँ और बेला तो हमेशा ही खुश रहते हैं, पड़ोस वाली माथुर आंटी भी, बिट्टू की पड़ोसन भी और खुद बिट्टू भी। एक मिनट…क्या ज़्यादातर औरतें खुश रहती हैं हर दिन? तो फिर वाक़ई में औरतों के सभी दिन एक समान होते हैं?

स्त्रियों के इस आयाम का अहसास मेरे कानों में कुछ कह रहा था।  मैंने सुना कि कुछ स्त्रियाँ, दुःख छुपाकर खुश दिखती हैं, कुछ दर्द दबाकर , कुछ स्त्रियाँ खुश हैं अपने परिवार को आगे बढ़ता देख , तो कुछ आख़री निवाला अपनी संतान को देकर भूखी सो जाने में खुश हैं।

तालियों की गूँज से वापस मैरिज हॉल में आया तो देखा – गुप्ताजी बिंदी लगा रहे थे गुप्ताइन को। मैं मुस्कुराया।  औरतों के माथे पे टिकी ये वही ब्रहाण्ड रूपी बिन्दी है !

आपके नाम का स्कूल

दौड़-भाग से भरी इस ज़िन्दगी में दादा-दादी की अनुपस्तिथि से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। पर यह बात सिर्फ वही कह सकता है जो या तो जन्म से दादा-दादी के प्रेम से वंचित रहा हो या वो जिसे परिवार-प्रेम की परिभाषा का कोई ज्ञान न हो। भाग्य से, मैं उनमे से हूँ जिनके पिता ने दादा-दादी को सदैव कहानियों में ज़िंदा रखा।

मैंने अपने बाबू (दादाजी) को कभी नहीं देखा पर अम्मा (दादीजी) की कुछेक यादें अब भी कैद हैं ज़हन में। सब कहते हैं मैं अम्मा जैसी दिखती हूँ और मेरी आदतें बाबू जैसी हैं।

परिवार को महत्त्व देने वाले और साधारण सोच रखने वाले मेरे माता पिता ने हमारा बचपन भरा था आदर्शों और मानवीय मूल्यों से जिनके अप्रतिम उदाहरण सदा ही मेरे दादा-दादी और नाना-नानी हुआ करते थे।

बाबू , लाल का पुरवा गाँव के स्कूल के हेडमास्टर हुआ करते थे। वे गाँव और आसपास के क्षेत्र में अपनी दयालुता और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध थे। और अम्मा एक आम गृहणी थीं जो पूर्ण निष्ठा से अपने परिवार का पालन पोषण करती थीं। अम्मा-बाबू मेरी याद में हमेशा शिव-पार्वती की मूर्त जैसे दिखे हैं। मेरे पिता के भगवान थे वो।

पर पेड़ कितना भी पुराना और मीठे फल देने वाला क्यों न हो ,हर साल एक-दो कसैले आम तो आ ही जाते हैं। दोष किसका है? सामाजिक प्रदूषण का ? पैसे के लोभ का ? या दिखावे की संस्कृति का?

दिखावे की संस्कृति से याद आया कि कुछ लोग बाबू के नाम से स्कूल खोल रहे हैं। पहली बार सुनने में प्रसन्नता होती है पर पूरे खेल की पृष्ठ्भूमि जानकर मन को धक्का लगता है। दुःख लगता है यह जानकर कि लोग लोभ में कितने अंधे हो जाते हैं। सपनों के अँकुर को बेड़ियों से नहीं बाँध सकते पर काँटा चुभता है जब द्वेष से पनपा अँकुर अपनी ज़मीन पर सांस ले रहा हो।

पर मेरे पिता कहते हैं कि यह सीख भी बाबू की दी हुई है कि – जो होता है अच्छे के लिए होता है, जो होगा अच्छे के लिए होगा और यह भी कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं।

मेरी आशा की बाल्टियाँ हमेशा ही भरकर बहती रहती हैं। इसलिए मुझे उम्मीद है कि वे सभी जो इस दौड़-भाग भरी ज़िन्दगी में रास्ता भूल गए हैं ,लौटकर घर आएंगे,अपने परिवार के पास।

कैलाश पर्वत पर

आदर से सिर झुकाया नहीं कभी

वो आज

पृथ्वी पर आपके नाम का मंदिर बनवा रहे हैं।

देवी पार्वती का

पुत्र-प्रेम मन को भाया नहीं कभी

वो आज

पावनता का चोला पहने आगे आ रहे हैं ।

महाप्रभु शम्भू के

आदर्शों को सीने से लगाया नहीं कभी

वो आज

गणेश को मानवीय मूल्यों की दुहाई दिए जा रहे हैं ।

फल्गु नदी में

पित्रों का पिण्डदान कर पाया नहीं कभी

वो आज

काम के लिए शिव का नाम जपे जा रहे हैं ।

शिव की महिमा ,गौरा की गरिमा

का मान रख पाया नहीं कभी

वो आज

अपने क्षुद्र दम्भ का घण्टा बजा रहे हैं।

इस लेख एवं कविता में प्रस्तुत मत पूर्णतः मेरे स्वयं के हैं। किसी भी प्रकार की आपत्ति एवं परिणामी चर्चा के लिए मुझे मेरे फेसबुक मैसेंजर पर सन्देश भेजें.

कविता का भाव पसंद आया हो तो लाइक करें और शेयर भी करें।

मेलानिन, आई लव यू !

मुश्किल से दो या तीन बार ही होता है हफ्ते में जब काव्या मुझसे वो तीन जादुई शब्द कहती है – आई लव यू ! दरअसल काव्या को मेरी याद तब तक नहीं आती जब तक कोई उसे याद नहीं दिलाता कि वो साँवली है | हफ्ते का ये दिन मेरे लिए बहुत ख़ास होता है क्योंकि आज काव्या मुझे अपनाती है, अपनाती है अपना साँवला रंग जो मेरे होने से है और अपनाती है अपने आपको |  

आज सुबह उठते ही न जाने क्या देख लिया काव्या ने फेसबुक पर कि दिनभर उसका काम में मन लगा ही नहीं | इंस्टाग्राम लेकर बैठी है , उन तमाम गोरी लड़कियों की प्रोफाइल देख रही जिन्हे एकलव्य ने फॉलो किया है | सच कहूँ तो मुझे नफरत है एकलव्य से क्योंकि , उसके होने से काव्या को मेरे होने का एहसास नहीं होता | एकलव्य भी मुझसे उतनी ही नफरत करता होगा ! शायद इस कारण से काव्या से दूर हो गया | पर मैं कभी काव्या का साथ नहीं छोड़ूँगा , न कभी छोड़ा है | मेरा प्यार ही तो बचाता आया है उसे हमेशा , कभी सूरज की हानिकारक किरणों से तो कभी लोगों की मंदबुद्धि से |

जब मन उठ जायेगा इंस्टाग्राम से तब काव्या खड़ी हो जाएगी शीशे के सामने , देर तक निहारेगी अपने आपको | मन के कान सुनेंगे बातें दिल की और दलीलें दिमाग की | फिर वो मुस्कुराएगी और कहेगी -” मेलानिन,आई लव यू “| 

यूँ तो मेरी याद काव्या को तब भी आती है जब एक प्यारी गहरे गुलाबी रंग की फ्रॉक, चेंजिंग रूम में पहनकर काव्या अपने आपको देखती है और तपाक से मुँह से निकलता है – ” ईयू , कुछ ज्यादा ही ऑड लग रहा है ” | 

काव्या को मेरी याद दिलाने वाले और दूसरे माध्यम हैं – ब्यूटी पार्लर्स | ये आंटियां तो मानो जान ही ले लेती हैं काव्या की , ये बोल बोलकर कि -” कितना पिगमेंटेशन हो गया है “| ऐसी जगहों से कतराना लाजमी है | 

कभी सोचता हूँ कि काव्या गाली तो ज़रूर देती होगी मुझे , खासकर तब, जब कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का बिल लम्बा चौड़ा आता है | 
मुझे बहुत बुरा लगता है जब काव्या को मेरी वजह से बातें सुननी पड़ती हैं | कोई कहता है -” दिन,प्रतिदिन काली होती जा रही हो , शादी करने का विचार छोड़ दिया है क्या”| तो कोई नुस्खे बताता है गोरे होने के | कई कहकर जाते हैं कि , ” ये रंग तुमपर जँच नहीं रहा ” तो कई बिन कुछ कहे ही दूर हो जाते हैं | और रह जाती है काव्या , शीशे में निहारती, कहती -” आई लव यू,मेलानिन ” |
मेरा होना या न होना किसी व्यक्ति की खूबसूरती का मानक कैसे हो सकता है ? ये बात मुझे आजतक समझ नहीं आई | पैदा होने से लेकर शादी होने तक , क्यों रंग , काला या गोरा, निर्धारित करता है किसी की सुंदरता? क्यों?? क्यों कृष्ण स्वीकार्य हैं लेकिन काली नहीं? काश लोग दिल पर जमे मैले मेलानिन को भी देख पाते |

माँ की कुछ बातें और यादें

‘ प्रेक्टीन ई ‘ | माँ की सबसे पहली याद, प्रेक्टीने ई की नीले लेबल वाली भूरी दवा की शीशी की है | माँ को खून की कमी थी | याद है मुझे, माँ पहले कैसी सूखी डंडी हुआ करती थी | आजकल तो माशा-अल्लाह ! माधुरी दीक्षित शर्मा जाए , ऐसा फिगर मेन्टेन किया है माँ ने | और याद है मुझे , माँ की बड़ी बिंदी | नब्बे के दशक में भी माँ फैशन का अच्छा खासा ध्यान रखती थी | सो तो आज भी रखती हैं | माँ को देखकर नहीं लगता कि वो एक आम गृहिणी हैं | इंजीनियरिंग कॉलेज के डीन से लेकर बैंक के जोनल मैनेजर तक ने उनसे एक ही सवाल किया है- ” कौनसी कम्पनी मे कार्यरत हैं आप मैडम?”| माँ तो इतना सुनते ही खुश हो जाती हैं | मुझे वाक़ई याद नहीं, पर दीदी की यादों में देखा है मैंने माँ को छोटे गोलू मोलू भाई को गोद में लिए घर का सारा काम करते हुए, एक आम गृहिणी की तरह |

माँ की ठहाके वाली हँसी पूरे मोहल्ले में फेमस थी | और आज भी है | पर ये बात हम ही जानते हैं कि चुटकुले सुनाने और समझने में, पूरी दुनिया में, माँ से बुरा कोई नहीं | एक मध्यम-वर्गीय परिवार के लिए बचत करना मशक्कत का काम होता है | पर माँ को कभी कोई मुश्किल दिखाई नहीं दी | उन्हें सिर्फ अपने तीनो बच्चों और पतिदेव का आज दिखता था | बचपन में मुझे ये बात बड़ी चुभती थी कि माँ हमेशा इतनी खुश रहती हैं तो उन्हें नींद क्यों नहीं आती | याद है मुझे, स्कूल से आने के बाद जब सब खाना खाकर सो जाते थे तो माँ कहती – ” टून , मैं लेटी हूँ, थोड़ा बालों में कंघी कर देना “| मैं बड़ी मेहनत से ,तकनीक लगाकर माँ के बालों में गुलाब बनाती थी , पर वो अपने आप ही खुल जाता था | मैं अपने छोटे हाथो पर अफ़सोस करती और सोचती कि जब बड़ी हो जाउंगी तो शायद अच्छा गुलाब बना पाऊँगी माँ के बालों में | पर बड़ी हुई तो पता चला कि माँ तो माँ निकली! माँ जानबूझकर गुलाब खोल दिया करती थीं | नींद की आशा में ,वो चाहती कि कुछ और देर मैं उनके बाल सवारूँ | अच्छा हुआ , माँ ने बाल कटवा लिए, क्योंकि वो गुलाब बनाने वाली तकनीक अब याद नहीं |

यादें माँ की याद दिलाती हैं उन जनरल नॉलेज की बुक्स की जो माँ लाकर दिया करती थी मुझे | और फिर होता था हम दोनों के बीच मुकाबला | माँ कभी मुझे जीतने नहीं देती थी और न ही हारने देती थी | ये बात तो आज तक कायम रखी है माँ ने – माँ से बातों में कोई जीत नहीं सकता और माँ मुझे कितनी भी बड़ी परेशानी से हारने नहीं देती |

माँ का ज़िक्र हो और माँ के पसंदीदा गानों के कलेक्शन की बात न हो, ऐसा मुमकिन नहीं | रफ़ी की यादों से लेकर लता के नग्मों और बेस्ट ऑफ़ किशोर कुमार तक , सभी गाने सुने हैं हमने बचपन से , जो आज भी गुनगुनाते हैं | माँ जब खाना बनाती, तब मैं और माँ , रैपिड राउंड अंताक्षरी खेलते और फिर निकलते माँ के दिमाग से उपजे कुछ कॉमेडी गाने |
मेरा छोटा भाई और दीदी, मुझे माँ की चमची कहते थे | मुझे कोई ऐतराज़ नहीं था क्योंकि मैं , ” बच्चा हु-ब-हु पापा जैसा दिखता है” वाली गैंग का हिस्सा नहीं थी | इसलिए, माँ की टीम में रहना फायदेमंद था | माँ हमेशा से ही मेरी बेस्टी थीं | यो यो हनी सिंह से लेकर प्रभास फ्रॉम बाहुबली तक उन्हें मेरी पसंद सबसे पहले बताई गई है | माँ का बेस्टी पता नहीं कौन है?पापा ही होंगे पक्का |
माँ की एक ख़ास बात है| माँ एक नंबर की पिन्नी हैं | रोना तो ‘मस्ट-टू-डू’ है माँ के लिए| फिर चाहे पडोसी की बहु क्यों न विदा हो रही हो, माँ रोयेंगी, वो भी फूट – फूट कर |
माँ की यादों और बातों मे शामिल हैं किस्से माँ के बचपन के, माँ की मुस्कान, माँ का गुस्सा, माँ की ज़िद्द, माँ के हाथ का खाना, माँ के ढेर सारे ख़ुशी वाले आंसू, माँ का त्याग और ढेर सारा प्यार |
मेरी प्यारी माँ ! जब हो जाओगी अस्सी बरस की , जब नहीं होंगे असली दाँत ठहाके लगाने को, तब याद करना आप मेरी ये बातें, बेतुकी सही मगर प्यार भरी | याद रखना आप कि जो साँसे आपने मुझे दी हैं , वो शब्द बनकर आपके ही किस्से सुना रही होंगी कहीं |

लच्छू के लक्ष्य

“लच्छू ए लच्छू,अब उठ जा रे ” 

हे अल्लाह ये अम्मी भी ना हद तंग करती हैं । नींद काहे की आई मेरे को , तब से जाग ही तो रहा हूँ । लच्छे खाँ तू किस चक्कर में पड़ रहा है रे ? काश सब पहले जैसा होता । मेरे को तो वो दिन याद आता है जब मैं पहली बार साब को गोन्दलपुर लेकर गया था । लौटते ही तारीफ की थी मेरी , मेरे सेठ से, की ड्रेविंग अच्छी कर लेता है छोरा । एक आध साल पहले ही तो मिले हैं साब मेरे से, मगर परिवार जैसे रखते हैं । पूरा गाँव भेला जानता है की साब लच्छू पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं और साब के भाई बहन भी मेरे सिवा किसी और ड्रेवर के साथ शहर नहीं जाते ।

अरे यार! ये गोपालदास फोन लगाए जा रहा है । ” हल्लो हाँ भैया! जा रहा हूँ साब को लेने। हाँ कर लूँगा बात तुम्हाई । बोली तो है मैंने तुमको। अब फोन रखो ।”

घड़ी इतनी धीमी काये को चल रही , सात ही बजे हैं । साब जब नए थे, मेरे देरी से आने पर खतरनाक डाँटते थे।दो तीन महीने हुए डाँट नहीं खाई ।हाँ तीन महीने ही तो हुए हैं साब का स्वभाव बदले। पहले साब रास्ते भर मेरी बातें सुनते थे मगर अब , ना सोते हुए भी नहीं सुनते। मेरे को नहीं कहते टेंशन अपनी , पर बात करते सुना है मैंने , अपनी मम्मीजी को कह रहे थे की टेबिल ( TA BILL) का टेंशन है थोड़ा।

न जाने क्या चीज़ है ये टेबिल , जिसकी वजह से ये दिन आया है । लप्पू की सालगिरह और ये गोपालदास।साब ने ही आदत बिगाड़ी थी मेरी । मैं ही मूरख था , सपने देखने लगा था । मेरेको थोड़े ही पता था सपने महंगे होते हैं । महंगे तो वो जूते थे जो साब मेरे लिए शहर से लाये थे। गाँव के सारे कहते- ” वाह फर्स्ट क्लास जूते हैं।”अम्मी ने तो ये तक कह दिया की जूते मेरे मुँह से ज्यादा सुन्दर हैं। चार बार कह चुका था साब से, जूतों के लिए । एक बार तो पैसे दे दिए थे साब ने , कहा खुद ही खरीद लेना। पैसों से तो मैंने दो बूसल्ट खरीद ली थी, मेरी भी ज़िद्द थी की साब के पसंद के जूते चाहिए बस ।

 साब की कोई गर्लफ्रेंड नहीं है पर राबिया की सारी बातें बताईं हैं साब को मैंने । साब कहते हैं – राबिया साथ नहीं देगी ज्यादा दिन तक, परिवार ही साथ देगा कब्र तक। उस रोज लप्पू और जिन्नाह के लिए पेस्ट्री खरीदकर दी थी साब ने । ईना तो ख़ुशी के मारे फूले नहीं समा रही थी की मैंने बच्चों के लिए मिठाई लाई है । उसी दिन मेरेको मालूम चला की ईना बहुत ज्यादा सुन्दर है, शायद राबिया से कई ज्यादा क्योंकि ईना के दिल की ख़ुशी उसके चेहरे पे दिखाई देती थी ।

लप्पू और जिन्नाह को साब के कहने पे बड़े स्कूल में डाल दिया है। बस दस दिन बाकी हैं लप्पू की सालगिरह के। काहे को मैंने उससे वादा कर लिया पाल्टी का । अगर साब मान जाते गोपालदास का काम करने के लिए तो वो मेरेको पाँच हज़ार देता। सालगिरह एक नंबर मनाता लप्पू की पूरे गाँव में ।

पैसा , टेबिल , नौकरी , ड्रेवरी , परिवार , इज्जत… हे अल्लाह क्या करूँ मैं ?

“ए ईना ये जिन्नाह क्यों रो रहा है।”

” अरे उसके प्यारे कीड़े से तितली निकल रही है , तो रो रहा है कि कीड़ा मर जायेगा ।”

“चुप करा यार बेंडे को।”

 आह तितली … आज तो जिन्नाह ने सबक सिखा दिया अब्बू को।

“हल्लो भैया, न हो पायेगा काम हमसे।आप कहीं और देख लो।अब फ़ोन रखो।”

अब जाकर मिला है सुकून। लप्पू की सालगिरह अगले साल मना लेंगे धूम धाम से।चलूँ आठ बज गए।साब को भी सुनाऊंगा किस्सा तितली का।