लाल

सितंबर की सियाह शाम में

घने काले बादलों की

छत के नीचे वाला फ़्लोर

लाल है

प्यार के गुलाल का रंग लाल है

लाल रंग, उन्मादी दिल के जुनून का भी है

दिमाग़ी समझ से

परे है ये ख़ुशी

चंद क़दमों का सफ़र ही सही

ख़ुश हूँ , आप साथ हो

सुनिए, हमसफ़र नहीं , रास्ता चुनिए

और आज़ादी के पंख बुनिए

कोई नाम न दें इस लाल जहान को

आईए, उड़ें

और नापे उन्मुक्त आसमान को

– शिवानी

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रात और रंग

आपके ख्यालों पर रात चढ़ रही

मेरे ख्यालों पर सपने

रात काली और राज़ भरी

सपने सुंदर से रंगीन

रंग जो चढे रात का ख्यालों पर

तो दिखे काला ही सब कुछ

और जो चढ़ें सपने ख्यालों पर

तो रंग भरें जीवन के खाली कैनवास में

जो रात करे कानों में फुसफुस

तो लगे कोलाहल सा जीवन में

जो सुनें रंगीन सपनों की भाषा

तो भर जाए संगीत जीवन में

तो फिर सुनो सच

सिर्फ सच

आत्मा का सच तो पूरा है

सपनों का सच अधूरा है

ख्वाहिश है दिल की

कि हों पूरे सपने

ख्वाहिश नहीं है दिल की

कि हो सपनों का सच पूरा

सपने जो पूरे हों

तो रखना कमी

सपनों के सच में

क्योंकि सपनों के सच के पूरा होने से

दौड़ोगे आप दो समानांतर रेखाओं के बीच

रेखाएं भूत और भविष्य की ।

– शिवानी

कविता हैं पापा

लाखों शब्दों और किरदारों से

बोझिल ये दुनिया

एक कहानी है

और कविता हैं पापा

ख्वाहिशों और जज़्बातों से भरी

चंद शब्दों में बयां

एक कविता हैं पापा

नदी, जो कलकल बहती हुई

नियमों के सागर में घुल जाती है

वही कविता हैं पापा

आशा के आँगन लीपती

तजुर्बे के सफ़ेद बालों से झाँकती

कविता हैं पापा

बेटे की मुस्कान में

और बेटी के स्वाभिमान में गूँजती

कविता हैं पापा

– शिवानी

बादल

उम्मीदों का हरा सिग्नल

पार किया ही था कि

चाँद के कटोरे से

बादल बह गए

भाग रही हूँ

मील के पत्थर गिनते

उधड़े जूते बुनते

भाग ही तो रही हूँ

आशाओं की डोर का छोर

थामा ही था कि

चाँद के कटोरे से

बादल बह गए

फँस गई है

प्यार की कटी पतंग

ख्वाबों के ऊँचे खम्बे पर

फँस ही तो गई है

जिम्मेदारियों के हवाई जहाज़ ने

उड़ान भरी ही थी कि

चाँद के कटोरे से

बादल बह गए

खो गया है

समुन्दर, सवालों का

आज़ाद है

पँछी, पिंजड़े से

और पा लिया है

साथ, ख़ुद का

छिप गया , वो चमकता चाँद

और

इस उन्मादी दिल को

आज़ाद कर

बादल यहीं रह गए ।

– शिवानी

LOVE AND CHANGE

He said, he won’t change.

He says, he hasn’t changed.

He will soon ask me, Why I am changing?

Have I changed?

I don’t know.

Right now, I can’t put my finger on it.

But then,

There’s this tinge of emotions

That seems to put a veil on me,

That makes me feel unwanted and unloved.

I expected this to happen.

But it happened too soon.

I saw it coming

When you welcomed me with those red roses,

That had hidden thorns.

– Shivani Singh